इन्डिया कोर्ट से जुड़े कुछ ऐसे केस जिन्होंने भारत में नए कानून के लिए रास्ता बनाया

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एक देश की न्यायिक प्रणाली समय और अपराधिक केस के साथ विकसित होते रहते है। देश के कानूनों में संशोधित हुए कानून समाज परिवर्तन की नींव रखते है। भारत में कई ऐसे मामले हुए जिन्होंने मीडिया का ध्यान खींचने के साथ नए समाज की नींव भी रखी है। कुछ मामलों के आधार पर कानूनों को संशोधित करना आसान नही था उन मामलों हमारी न्यायिक इतिहास काफी उथल पुथल मचा दी थी। आइयें जानतें है कुछ ऐसे मामलों को जिन्होंने नए कानून के निर्माण का नेतृत्व किया है।



निर्भया प्रकरण : किशोर न्याय कानून में बदलाव : 16 दिसंबर 2012 को, सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले ने समूचे भारतवर्ष को हिलाकर रख दिया है। एक 23 वर्षीय लड़की के साथ मारपीट करके बस में बलात्कार किया गया था। बलात्कार के बाद अपराधियों ने लड़की को सड़क पर उसके बेजान फेंक दिया था। इस अपराध में कुल 6 लोग शामिल थे। 6 अपराधियों में 5 वयस्क और एक किशोर था।

किशोर की उम्र 17 साल थी। वयस्क को 10 साल की सजा सुनाई गयी थी जबकि किशोर को 3 साल के लिए सुधारक सुविधा भेज दिया गया था। इन सभी आपराधियों में से एक जेल की कोठरी में मृत पाया गया था। यह मामला क्रूर कृत्य था जिसके बार जानकार हर कोई हैरान और गुस्से से भर गया था। निर्भया प्रकरण के बाद 2000 एक्ट में किशोर न्याय अधिनियम बदलाव करते हुए अपराध की किशोर उम्र 18 साल से घटा कर 16 साल कर दी गयी है।

शाह बानो बेगम बनाम मोहम्मद अहमद खान : मुस्लिम महिलाओं के लिए एक जीत : शाहबानो पांच बच्चों की मां थी और 62 वर्ष की आयु में जब उन्होंने अपने पति मोहम्मद अहमद खान पर 1978 में गुजारा भत्ते के लिए याचिका दायर की तो समूचे मीडिया और इस्लामी रीति-रिवाजों की दुहाई देने वालों लोगो की दुनिया में भूकंप आ गया।

यह गुजारा भत्ता की याचिका इसलिए अहम हो गयी थी क्योकि यह इस्लामी रीति-रिवाजों के खिलाफ थी। उच्चतम न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता और महिलाओं के कल्याण को सामने रखते हुए शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया। इस प्रकार, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत महिलाओं को रखरखाव का हकदार बनी।

इस फैसले के अनुसार अब पूर्व जीवन साथी से 3 महीने के बुनियादी रखरखाव का हक मिला है। उनकी देखभाल के लिए उनके रिश्तेदारों या वक्फ बोर्ड को रखरखाव देखभाल का हक मिलता है।



केएम नानावटी बनाम महाराष्ट्र राज्य : जूरी परीक्षण समाप्त : केएम नानावटी नौसेना के एक अधिकारी थे उनके दोस्त प्रेम आहूजा के साथ उनकी पत्नी सिल्विया का अफेयर चल रहा था। 27 अप्रैल, 1959 को सिल्विया ने अपने पति से कबूल किया था की वह आहूजा के साथ प्यार में थी लेकिन आहूजा का शादी करने का इरादा नही था। नानावटी थिएटर में बंद अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ कर प्रेम आहूजा का सामना करने के लिए चला जाता है।

नानावटी प्रेम आहूजा से सिल्विया से शादी और बच्चों की देखभाल करने के बारें में पूछता है जिसके बाद प्रेम मना कर देता है जिसके बाद नानावटी उसे गोली मार देता है। पेचीदा इस कहानी को मीडिया कवरेज से कुछ प्राप्त किया और जूरी द्वारा 'प्रभावित' करने के लिए कहा गया था। प्रभावशाली परिवारों के साथ नानावटी के कनेक्शन के कारण जूरी का फैसला प्रभावित हुआ ऐसा उस वक्त माना गया।

इस केस में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी दिलचस्पी रही थी। यह केस मुंबई उच्च न्यायलय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा गया था। न्यायाधीश ने जूरी के फैसले को खारिज कर दिया और नानावटी हत्या का दोषी पाया और इसी कारण आजीवन कारावास की सजा सुनाई हालाकि 3 साल बाद माफी मिल गयी थी। इस मामले से यह तथ्य निकलकर आया की से जूरी प्रणाली को खत्म किया जाएँ और इस केस के बाद से ही जूरी प्रणाली को समाप्त कर दिया गया।

मैरी रॉय बनाम केरल राज्य : बेटियों बराबर हो गयी : मैरी रॉय, अरुंधति राय की मां उत्तराधिकार अधिनियम को चुनौती देने का फैसला किया था और यह दरअसल तब हुआ था जब उनके पिता का वसीयत छोड़ने से पहले ही निधन हो गया था। त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1092 के अनुसार अगर एक आदमी अपनी बेटी के लिए एक वसीयत छोड़ने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और उसका एक बेटा है तो संपत्ति बेटे को मिल जाएंगी।

मैरी रॉय अनुच्छेद 14 लागू करने और संपत्ति के अधिकार में समानता के लिए लड़ाई लड़ी। उनकी यह लड़ाई सिर्फ खुद के लिए ना हो कर सभी सीरियाई ईसाई महिलाओं के लिए था। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 को त्रावणकोर और कोचीन में ईसाइयों के लिए लागू किया जिसके अधिनियम से बेटों और बेटियों के लिए बराबर उत्तराधिकार के अधिकार की मान्यता मिली। यह केस पूरे समुदाय के लिए एक बड़ी जीत बन कर उभरी।

मथुरा रेप केस : बड़ा परिवर्तन लाने वाला केस : 26 मार्च, 1972 को एक आदिवासी महिला की रात को यह कह कर बुलाया गया की उसके भाई ने उसके प्रेमी के खिलाफ शिकायत की है। स्टेशन पर अधिकारियों उसके साथ बलात्कार किया और उसके बाद उसे जाने दिया। उस मथुरा आदिवासी महिला ने मथुरा कांस्टेबल के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करने का निर्णय लिया।

उच्चतम न्यायालय ने पुलिस के पक्ष में आम सहमति से विपरीत फैसला सुनाते हुए कहा कि मथुरा के शरीर पर संघर्ष के कोई निशान नहीं थे और उसने आवाज भी नही उठाई थी लेकिन मथुरा ने कहा कि उसे धमकी दी गयी थी। एक विशाल सार्वजनिक हंगामे के बाद भारतीय कानून नियम को बदलाव लाने के लिए मजबूर किया गया। 1983 में संशोधन का मतलब है कि हिरासत में बलात्कार एक दंडनीय अपराध और इसे भारत की बलात्कार कानूनों के तहत शामिल किया गया।

विशाखा बनाम राजस्थान राज्य : कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं की रक्षा : 1992 में एक सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी के एक गिरोह द्वारा राजस्थान के एक गांव में बलात्कार किया गया था। यह बलात्कार केवल इसलिए किया गया था क्योकि अपनी एक साल की बेटी शादी करने वाले रिवाजो को हतोत्साहित करने की कोशिश कर रही थी। विशाखा ने इस जुल्म के खिलाफ केस दायर किया जिसमें उनको कई गैर सरकारी संगठनों से मदद प्राप्त हुई।

उनके प्रयासों उसकी मदद से आज पूरे देश में महिलाओं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और लैंगिक समानता के नए कड़े ताकतवर कानून प्राप्त हुए है। 1997 से पहले एक कार्यस्थल पर इस तरह के मामलों से निपटने के लिए कोई दिशानिर्देश नहीं थे। अप्रैल 2013 के रूप में दफ्तर में महिलाओं का यौन उत्पीड़न, (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम में विशाखा दिशा-निर्देश पर कानून को प्रभावी बनाया गया है।



राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य : मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए गोपनीयता का अधिकार : 1994 में, एक हत्या के दोषी पाए गए कैदी ने आत्मकथा लिखी थी और उसने इसके प्रकासन के लिए मद्रास में एक साप्ताहिक मैगज़ीन से भी बात कर ली थी। इस आत्मकथा में हत्या के अतरिक्त कई वरिष्ठ अधिकारी के शामिल होने वाले फैक्ट्स थे।

अधिकारियों को इस स्टोरी से डर लगने लगा और उन्होंने इस कहानी के लिए व्यकित पर मानहानि के लिए मुकदमा कर दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया हाउस के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा की सरकारी अधिकारियों को केवल प्रकाशन घरों पर मुकदमा करने का अधिकार तब है जब प्रकाशित सामग्री झूठी हो।