एक नजर रुस्तमे हिंद दारा सिंह के जीवन से जुड़े फैक्ट्स पर

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19 नवम्बर 1928 सोमवार के दिन वीरों की धरती पंजाब के धरमूचक गांव में एक ऐसे शख्स का जन्म हुआ जिसका नाम लेते हुए हर भारतीय का सीना चौड़ा और गर्दन गर्व से असमान छूने लग जाती है। पहलवानी और अभिनय के क्षेत्र में अमिट इतिहास छोड़ जाने वाले इस शख्स का पूरा नाम दारा सिंह रन्धावा था। दारा सिंह द्वारा कुश्ती में दिए योगदान और रामायण में किया हुआ उनका हनुमान का रोल मरने के बाद उनको भारतीयों के बीच जीवंत किये हुए है। आज हम उसी महान शख्सियत रुस्तमे हिंद दारा सिंह के जीवन से जुड़े कुछ राज आपके साथ शेयर कर रहे है।




  • दारा सिंह का जन्म श्रीमती बलवन्त कौर और श्री सूरत सिंह रन्धावा के घर हुआ था और उनके माता-पिता ने उनकी परवरिश करते हुए उनका विवाह बहुत ही छोटी उम्र में के बड़ी उम्र वाली लड़की से कर दिया था।


  • छोटी उम्र में विवाह होने के बाद उनकी माँ की बड़ी तमन्ना थी कि उनका यह पुत्र जल्दी से जल्दी बड़ा हो जाए इसलिए वह लगभग 100 बादाम को मक्खन में पीस कर दूध के साथ देती थी।


  • माँ के हाथों उच्च खुराक मिलने के वजह से दारा सिंह का शरीर जल्द ही पहलवानी वाला शरीर लगने लगा।




  • दारा सिंह कुश्ती में नाम कमाने से पहले नाबालिग होते हुए 17 साल की उम्र में एक पुत्र प्रद्युम्न को जन्म दिया था जो आजकल मेरठ में रहते है।





  • दारा सिंह ने अपने जीवनकाल में दो विवाह किये थे एक तो बचपन में घर वालों की मर्जी से और दूसरा नाम कामने के बाद एम०ए० पास लड़की सुरजीत कौर से जिनसे उनको 5 बच्चों को प्राप्त हुए जिनमे तीन लड़कियां और दो लड़के थे। मुंबई में रहने वाले विन्दु दारासिंह दूसरी माँ के पुत्र है।





  • दारा सिंह का शरीर अच्छा होने की वजह से उन्होंने अपने भाई सरदारा सिंह रन्धावा के साथ मिल कर जल्द ही कुश्ती में अभ्यास कर बड़े-बड़े पहलवानों को धूल चटाने लग गये। इसी कारण उनके पास कुश्ती लड़ने के लिए राजा महाराजाओं के बुलावे आने लगे और वह अपने गांव से बाहर भी पहलवानी में विख्यात होने लगे।





  • विजय रथ पर सवार होकर कुश्ती के लिए सफर करने वाले दारा सिंह ने 1947 में पहलवान तरलोक सिंह को कुआलालंपुर में, 1959 में हंगरी के विश्व चैम्पियन किंगकांग को,कनाडा के पेशेवर पहलवान जार्ज गारडियान्का और न्यूजीलैण्ड के जान डिसिल्वा को हराकर अपना और देश का परचम विदेशों तक लहराया। 6 फुट 2 इंच लम्बाई और 127 किलो वजन वाले इस रुस्तमे हिंद ने सभी देशों में अपनी धाक कयाम कर कुश्ती चैम्पियन का ख़िताब अपने नाम कर लिया।






  • दारा सिंह भारतीय कुश्ती के चैम्पियन 1954 में ही बन गये थे और और 29 मई 1968 को अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को धूल चटाकर वह फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन भी बन गये थे।






  • दारा सिंह ने अपनी उम्र के लगभग 55 साल कुश्ती को दिए और इस दौरान उन्होंने भिन्न-भिन्न स्टाइल में कुश्ती करते हुए कुल 500 के करीब मुकाबले किये और किसी भी मुकाबले में उन्होंने हार का मुहं नही देखा।







  • 1983 में दारा सिंह ने पहलवानी करते हुए अपनी आखरी कुश्ती जीती थी जिसके बाद उस समय के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उन्हें अपराजेय पहलवान का खिताब दिया और इसी ख़िताब के साथ दारा सिंह ने कुश्ती से सन्यास ले लिया।



  • दारा सिंह ने पहलवानी के साथ-साथ बॉलीवुड फिल्मों में भी हाथ अजमाया और हर जगह अपनी जीत के झंडे गड़ने वाले इस पहलवान खिलाडी ने बॉलीवुड में कुल 148 फिल्मों में अभिनय किया और साथ में 1978 में मोहाली के अंदर एक दारा स्टूडियो की नींव भी रखी।




  • दारा सिंह और मुमताज की जोड़ी 60 के दशक में बॉलीवुड की सबसे सफल और महगी जोड़ी थी ये जोड़ी 60 के दशक में हर फिल्म के लिए 4 लाख रूपये लेती थी।




  • दारा सिंह ने अभिनय के साथ-साथ कुल 7 फिल्में भी लिखी थी। 1978 में आई फिल्म भक्ति में शक्ति का लेखन और निर्देशन दारा सिंह ने ही किया था इस फिल्म के साथ-साथ दारा सिंह मेरा देश मेरा धर्म में भी बतौर निर्देशक काम कर चुके है।




  • शाहिद कपूर और करीना कपूर खान के साथ उनकी आखरी फिल्म जब वी मैट थी।




  • कभी किसी भी दांव से हार न मानने वाला ये पहलवान गुरुवार 12 जुलाई 2012 को बिमारी से हार गया और सुबह साढ़े सात बजे "दारा विला" में अपने जीवन की आखरी सांसे ली।



दारा सिंह को बेशक अभी तक भारत रत्न अवार्ड नही दिया गया है पर वह भारत के बहुमूल्य रत्नों में से एक है और दुनिया के किसी भी कोने में बसने वाले भारतीय उनका नाम बड़े फर्क से लेता है।